गोवत्स द्वादशी कहानी और पूजा और क्या करे ?

धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि हिंदू धर्म में गाय माता सभी तीर्थों में सर्वोच्च स्थान रखती है। इस त्यौहार को बछ बारस या गोवत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है।

यह भाद्रपद और कार्तिक महीने के बीच पड़ने वाला त्यौहार है।यह हर साल भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की द्वादशी को और जन्माष्टमी के चार दिन बाद दिवाली से पहले कार्तिक कृष्ण द्वादशी को मनाया जाता है।

गोवत्स द्वादशी कहानी

गोवत्स द्वादशी की कथा बहुत समय पहले की बात है भारत में स्वर्णपुरी नाम के नगर में देवदानी राज्य करता था उसकी दो रानियां थी एक का नाम सीता था और एक का नाम गीता था उसकी राज्य में एक गे थी एक भैंस थी सीता रानी भैंस से सहेली के समान और गीता रानी गे और बछड़े से सहेली और पुत्र सा प्यार करती थी एक दिन भैंस सीता से बोली हैरानी गे बछड़ा होने से गीता रानी मुझसे ईर्षा करती है।

सीता ने कहा यदि ऐसी बात है तो तू चिंता मत कर मैं सब ठीक कर दूंगी सीता ने उसी दिन गे के बछड़े को काटकर गेहूं के ढेर में काट दिया इस बात का किसी को पता ना चला राजा भोजन करने बैठा तब मैन की वर्षा होने लगी चारों ओर महल के अंदर मांस और खून दिखाई देने लगा भोजन की थाली थी उसका सब भोजन मल मूत्र हो गया यह देखकर राजा को बहुत चिंता हुई उसी समय आकाशवाणी ने कहा की बछड़े को काटकर गेहूं के ढेर में ढाबा दिया है।

इसी से यह सब कुछ हो रहा है कल गोवत सुजल सी है इसलिए भैंस को राज्य से बाहर कर दो और गे और बछड़े की पूजा करो दूध और केट हुए फल नहीं खाना इसे तेरा पाप नष्ट हो जाएगा और बछड़ा भी जिंदा हो जाएगा साइकिल जब गईं आई तब राजा पूजा करने लगा और जैसे ही मैन में बछड़े को याद किया वैसे ही बछड़ा गेहूं के ढेर से निकलकर पास ए गया ।

भाद्र मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को गोवत्स द्वादशी का पर्व मनाया जाता है और कहीं-कहीं इस दिन को बछबारस भी कहा जाता है यानि कि इस दिन बछड़े के साथ एक गौ माता की पूजा की जाती है जानकारी के लिए बता दें कि यह व्रत माता अपनी संतान की लंबी उम्र के लिए रखती है चलिए आइए जानते हैं कि इस व्रत की पूजा विधि क्या है ।

गोवत्स द्वादशी पूजा

कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को भाद्र मास की गोवत्स द्वादशी तिथि के रूप में मनाया जाता है आज के दिन गोमाता और उनके बछड़े की पूरे विधि-विधान से पूजा करने से पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है आज के दिन गेहूं और दूध से बनी वस्तुओं का सेवन करना वर्जित होता है और माता गौ माता को और उनके अवशेषों को रोटी व गेहूं से बने रोटी और रोटी के साथ भोजन सामग्री आप खिलाते हैं ।

और उनका पूजन करते हैं तो उसके बहुत ज्यादा पुण्य फल आपको मिलते कि गोवत्स द्वादशी तिथि को जितने जितने ज्यादा लोगों की सेवा करेंगे उतना ज्यादा आपको इसके शुभ परिणाम मिलेंगे आज के दिन गौशाला अवश्य जाएं और गौ माता के साथ-साथ उसके बछड़े का पूजन करें धूप दीप नैवेद्य चढ़ाकर उनकी आरती उतारे और घर से बना शुद्ध भोजन उन्हें गिराएं और गौमाता और बछड़े के सामने नतमस्तक होकर चरण स्पर्श कर अपनी मनोकामना की पूछते आप उनसे मांग सकते हैं।

ऐसा माना गया है कि गौमाता में 33 कोटि देवी देवताओं का वास होता है तो गौशाला के आसपास का जो वातावरण होता है वह देव तुम लिए अधिक स्वर्ग जैसा वातावरण माना जाता है।

जी व्यक्तियों का शुक्र वीक है या शुक्र संबंधित परेशानियां चल रहे हैं वह आज गौ माता को हरा चारा जाकर अ खिलाएं डालें और साथ-साथ गौमाता के मंत्रों का उच्चारण करें गौ सेवा करें बहुत जगह इसका आपको लाभ मिलेगा ।

गोवा चक्र द्वादशी तिथि को नंदनी व्रत के रूप में भी मनाया जाता है तो बहुत से लोग आज के दिन व्रत करते हैं संध्या के समय क्योंकि जो गौ पूजन होता है वह गोधूलि बेला में होता है गोधूलि वेला रुके समय गौमाता को घर से बना भोजन जो है इसका भोग लगाया जाता है उस समय माता की पूजा होती है और इसके पश्चात जो व्रत का है।

वह समापन किया जाता है व्रत समापन पर आप अपने घर के सभी सदस्यों के साथ बैठकर भर घर का भोजन ग्रहण कर सकते हैं और आज के दिन खास तौर पर ध्यान रखें गेहूं और दूध से बनी चीजों का बिल्कुल भी सेवन ना करें और जितना ज्यादा आप आज के दिन आप दान पुण्य करेंगे उतना ही ज्यादा आपको शुभ परिणाम मिलेंगे।

क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:॥

गोवत्स द्वादशी क्या है महत्व और व्रत करने की विधि

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गौ माता में समस्त तीर्थ होने की बात कही गई है गौमाता के दर्शन से ही बड़े-बड़े यज्ञ दान आदि कर्मों से भी ज्यादा लाभ प्राप्त होता है गोवत्स द्वादशी का त्योहार दिव्य गाय नंदिनी को श्रद्धांजलि देता है गाय को हिंदू संस्कृति में एक बहुत ही पवित्र पशु के रूप में माना जाता है और इसे पवित्र मां के रूप में सम्मानित किया गया है क्योंकि हर इंसान को पोषण प्रदान करती है इस दिन महिलाएं नंदनी व्रत को अपने बच्चों खुशी और लंबे जीवन के लिए रखती हैं।

यह भी माना जाता है कि जो कोई भी संतानविहीन जोड़े इस दिन गाय की पूजा करते हैं और उपवास रखते हैं उन्हें जल्द ही एक बच्चे के साथ आशीर्वाद मिलता है इस उपवास के दौरान भक्तों किसी भी डेयरी या गेहूं के उत्पादों को खाने से दूर रहते हैं इस उत्सव का अवलोकन भारत के कई हिस्सों में बहुत उत्साहित किया जाता है और जो लोग इसे करते हैं उन्हें खुशी और समृद्धि से आशीर्वाद मिलता है।

पौराणिक जानकारी के अनुसार माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद इस वन गौमाता के दर्शन और पूजन किया था माता यशोदा ने इसे दिन गौ माता का दर्शन और पूजन किया था जिन्होंने गौमाता को खुद नंगे पांव जंगल-जंगल घुमाया हो और अपना नाम ही गोपाल रख लिया हो वह माता की रक्षा के चलते ही श्री कृष्ण ने गोकुल में अवतार लिया था शास्त्रों में कहा गया है कि हर योनी में मनुष्य योनि सबसे श्रेष्ठ है कि ऐसा इसीलिए कहा गया है।

जिससे मनुष्य गौमाता की निर्मल छाया में अपने जीवन को धन्य कर सके इनकी सेवा से बड़ा कोई अनुष्ठान नहीं है भविष्य पुराण के अनुसार गौ माता की पृष्ठ देश में ब्रह्म का वास माना गया है इनके गले में विष्णु का मुख में रुद्र का मध्य में समस्त देवताओं का समावेश है वहीं रोम कूपों में महर्षिगण पूंछ में अनंतनाग खेलों में समस्त पर्वत गौ मूत्र में गंगा दिनांक गोमेज में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चंद्र विराजमान है।

इस दिन महिलाएं अपने बेटे की दीर्घायु के लिए और परिवार की खुशहाली के लिए व्रत रखती हैं इस लेंथ विशेषकर परिवार में बाजरे की रोटी बनाई जाती है साथ ही अंकुरित अनाज की सब्जी बनाई जाती है।

इस दिन भैंस या बकरी का दूध इस्तेमाल किया जाता है शास्त्रों में इसका महत्व बताया गया है इसके अनुसार बछबारस के दिन अगर महिलाएं गोमाता की पूजा करती हैं और रोटी समेत हरा चारा खिलाती हैं तो उनके घर मां लक्ष्मी की कृपा सदैव बनी रहती है।

गोवत्स द्वादशी भारत में गोपियों और कृष्ण भक्तों द्वारा पूजे जाने वाले महत्वपूर्ण धार्मिक त्योहारों में से एक है। इस त्यौहार पर लोग गाय माता और उसके बछड़ों की पूजा करते हैं। यह हिंदू कैलेंडर के कार्तिक महीने के दौरान शुक्ल पक्ष की द्वादशी को पड़ता है।

गोवत्स द्वादशी का महत्व

हिंदू धर्म में गोवत्स द्वादशी का खास महत्व है यह कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर यानी धनतेरस से एक दिन पहले रखी जाती है इस अनोखे उत्सव पर इंसानों को पोषण प्रदान करने वाली गौ माता और उनके बछड़ों की पूजा की जाती है मान्यता है कि गाय में 84 लाख देवी देवताओं का वास होता है ऐसे में एक गाय की पूजा करने से 84 लाख देवी देवताओं का आशीर्वाद मिलता है।

गोवत्स द्वादशी एक हिंदू त्यौहार है जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि पर यानी धन तेरस से एक दिन पहले मनाया जाता है गाय को हिंदू संस्कृति में बेहद पवित्र पशु के तौर पर माना जाता है इस दिन महिलाएं अपने बच्चों की खुशी और लंबे जीवन के लिए व्रत रखती है इस व्रत को नंदिनी व्रत के रूप में भी जाना जाता है।